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गेंहू खरीदी और विधायक खरीदी में बहुत फ़र्क होता है साहब………

गेंहू खरीदी और विधायक खरीदी में बहुत फ़र्क होता है साहब………

यह पब्लिक है,यह सब जानती है

मध्य प्रदेश, एमपी विश्वास न्यूज

मध्य प्रदेश।बात विधायक खरीदने की होती तो घर में से निकालकर ख़रीद लिए जाते,लेकिन बात किसान की फसल की है,घर में पड़ा गेंहू पड़े पड़े खराब हो जाएगा लेकिन खरीदा नही जाएगा

आख़िर किसान के हक की लड़ाई कौन लड़े, चुनाव आने पर किसान भी सारी समस्याएं भूल जाता है,

क्योंकि चुनाव में एक ही नारा चलता है
एक ही नारा, एक ही काम बोलो जय सियाराम

अब करो अभिनंदन
#किसान

किसान के हक की लड़ाई आखिर लड़ेगा कौन?

नेता चुनावी मंचों से बड़े-बड़े वादे करते हैं—समर्थन मूल्य बढ़ाने के, समय पर खरीदी करने के, किसानों की आय दोगुनी करने के।

लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि किसान आज भी अपनी उपज बेचने के लिए दर-दर भटक रहा है।

और दुखद यह है कि
चुनाव आते ही किसान भी अपनी पीड़ा भूल जाता है।

जाति, धर्म और नारों की भीड़ में उसकी अपनी समस्याएं कहीं खो जाती हैं।

“एक ही नारा, एक ही काम—बोलो जय सियाराम”
यह नारा गूंजता है, लेकिन इसमें किसान की फसल, उसका मूल्य, उसका संघर्ष कहीं नजर नहीं आता।
अब वक्त है सोचने का—
अभिनंदन किसका किया जाए?
उन नेताओं का, जो वादों की फसल उगाते हैं,

या उस किसान का, जो सच में धरती पर अन्न उगाता है?
अब सच में अभिनंदन होना चाहिए—किसान का।

क्योंकि अगर किसान हार गया,
तो यह सिर्फ एक वर्ग की हार नहीं होगी,
बल्कि पूरे देश की भूख की हार होगी।

दुष्यंत कुमार की यह पंक्तियां याद आती है

“कहाँ तो तय था चिराग़ां हर एक घर के लिए,
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए।”

जो वादे जनता से किए गए थे (विकास, समानता, खुशहाली), वे पूरे नहीं हुए।
बल्कि हालत और खराब हो गई—जहाँ हर घर में उजाला होना था, वहाँ पूरे शहर में भी अंधेरा है।

#संपादक,राजेश माँझी, एमपी विश्वास न्यूज
संपर्क,9200718280

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