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आदिवासी बच्चों की शिक्षा से खुला मज़ाक: स्कूल की छत नदारद, तपती धूप में पढ़ने को मजबूर मासूम

आदिवासी बच्चों की शिक्षा से खुला मज़ाक: स्कूल की छत नदारद, तपती धूप में पढ़ने को मजबूर मासूम

जर्जर भवन, टूटी दीवारें और ऊपर से नदारद छत — यह स्कूल कम और प्रशासनिक लापरवाही का जीता-जागता स्मारक ज़्यादा लगता है।

सीहोर/मध्य प्रदेश, एमपी विश्वास न्यूज

सीहोर।मध्यप्रदेश में “शिक्षा के अधिकार” की हकीकत एक बार फिर शर्मसार हो गई है। सीहोर जिले के इछावर विकासखंड स्थित प्राथमिक शाला सुआखेड़ा में आदिवासी बच्चों का भविष्य खुले आसमान के नीचे झुलस रहा है। स्कूल भवन की हालत इतनी बदतर है कि कक्षा के ऊपर छत ही नहीं, और बच्चे बिलबिलाती धूप में ज़मीन पर बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं।

जर्जर भवन, टूटी दीवारें और ऊपर से नदारद छत — यह स्कूल कम और प्रशासनिक लापरवाही का जीता-जागता स्मारक ज़्यादा लगता है। सवाल यह है कि जब छत ही नहीं तो यह स्कूल किस भरोसे संचालित किया जा रहा है? क्या आदिवासी इलाकों के बच्चों की ज़िंदगी और शिक्षा की कोई कीमत नहीं?

एक ओर सरकार शिक्षा के बड़े-बड़े दावे करती है, दूसरी ओर सुआखेड़ा के मासूम बच्चे धूप, बारिश और खतरे के साए में पढ़ने को मजबूर हैं। किसी बड़े हादसे का इंतज़ार क्यों किया जा रहा है?

स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार शिकायतों के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी आंखें मूंदे बैठे हैं। यह सीधा-सीधा आदिवासी बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।

अब सवाल प्रशासन से है —
कब बनेगी स्कूल की छत?
कब मिलेगी इन बच्चों को सुरक्षित शिक्षा?
या फिर ये बच्चे सिर्फ़ सरकारी काग़ज़ों में ही “शिक्षित” माने जाएंगे?

क्या कहते हैं ज़िम्मेदार
ऑनलाइन यू डाइस के आधार पर बिल्डिंग या मरम्मत का पैसा सरकार द्वारा दीया जाता है। जब आबंटन होगा, मरम्मत कराई जायेगी।

बीआरसी
सुभाष दुबे
शिक्षा विभाग इछावर

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