
मध्य प्रदेश में चिंतामण गणेश के दो मंदिरों में पहला भोपाल संभाग के सीहोर जिले में और दूसरा उज्जैन के पास ग्राम ज्वासिया में है। माना जाता है कि ये मंदिर अपने आप में चमत्कारी और सिद्ध हैं।
सीहोर राजेश माँझी, एमपी विश्वास न्यूज
आज बात सीहोर के चिंतामण गणेश मंदिर की….
ये मंदिर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 37 किमी दक्षिण-पश्चिम में भोपाल-इंदौर राजमार्ग पर स्थित है। मान्यताओं के अनुसार भगवान गणेश का ये मंदिर करीब 2000 साल पुराना है। इस मंदिर की ऐसी मान्यता है कि यहां उल्टा स्वास्तिक बनाकर मन्नत मांगने से वो मन्नत जरूर पूरी होती है। मंदिर में साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है, खासकर गणेश चतुर्थी के दौरान यहां भक्तों में काफी उत्साह देखा जाता है।
मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा
चिंतामन सिद्ध गणेश मंदिर को लेकर एक पौराणिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि सम्राट विक्रमादित्य भगवान गणेश के उपासक थे और वे अक्सर राजस्थान में भगवान गणेश के दर्शन करने जाते रहते थे। एक बार उन्होंने भगवान गणेश से उनके महल में स्थापित होने की प्रार्थना की। भगवान गणेश राजा से प्रसन्न होकर उनके साथ कमल पुष्प के रूप में चलने के लिए तैयार हो गए। गणेश जी ने राजा के सामने शर्त रखी कि जहां कमल का फूल खिल जाएगा वे वहीं स्थापित हो जाएंगे। राजस्थान से वापस आते समय अचानक सीहोर के पास आकर एक स्थान पर रथ का पहिया जमीन में धंस गया। काफी कोशिशों के बाद भी रथ का पहिया निकल नहीं सका और सुबह होते ही कमल का फूल खिल कर गणेश जी की प्रतिमा के रूप में बदल गया। राजा ने स्थापित प्रतिमा को निकालने की कोशिश की लेकिन वह जमीन में धंसने लगी। बाद में भगवान की इच्छा समझकर राजा विक्रमादित्य ने सीहोर में ही मंदिर बनवाकर प्रतिमा स्थापित करा दी। भगवान गणेश की प्रतिमा आज भी आधी जमीन में धंसी हुई है।इतिहासविदों की मानें तो मंदिर का जीर्णोद्धार एवं सभा मंडप का निर्माण बाजीराव पेशवा प्रथम ने करवाया था। शालीवाहन शक, राजा भोज, कृष्ण राय तथा गौंड राजा नवल शाह आदि ने मंदिर की व्यवस्था में सहयोग किया था। नानाजी पेशवा विठूर के समय मंदिर की ख्याति और प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई है।*गणपति की मूर्ति की आंख चांदी की बनी है*मंदिर में स्थापित गणपति की मूर्ति की आंख चांदी की बनी हुई हैं। कहा जाता है कि जब राजा विक्रमादित्य ने ये मूर्ति स्थापित की थी तब इस मूर्ति की आंखें हीरे की थीं। स्थानीय लोगों के अनुसार 150 साल पहले जब ये मंदिर खुले परिसर में था तो मूर्ति की हीरे की आंख चोरी हो गईं। कई दिनों तक आंख की जगह से दूध की धार टपकती रही और फिर मुख्य पुजारी के स्वप्न में गणपति जी ने आकर इस जगह चांदी की आंख लगाने का आदेश दिया। पुजारी ने इसे चिंतामन मंदिर में स्थापित गणपति के नए जन्म के रूप में माना और चांदी की आंख लगाने के अवसर पर भंडारा किया। तब से हर साल उस दिन की याद में यहां मेला लगता है।*उल्टे स्वास्तिक की कथा*यहां हर माह गणेश चतुर्थी पर भंडारा करने की प्रथा है। स्थानीय लोगों के अनुसार 60 साल पहले यहां प्लेग की बीमारी फैली थी। तब इसी मंदिर में लोगों ने इसके ठीक होने की प्रार्थना की और प्लेग के खत्म हो जाने पर गणेश चतुर्थी मनाए जाने की मन्नत रखी। प्लेग ठीक हो गया और तब से हर माह गणेश चतुर्थी पर भंडारे की यह प्रथा चली आ रही है। यहां आने वाले श्रद्धालु मंदिर के पिछले हिस्से में उल्टा स्वास्तिक बनाकर मन्नत मांगते हैं और पूरी हो जाने पर दोबारा आकर एक सीधा स्वास्तिक बनाते हैं और मन्नत पूरी के लिए भगवानन गणेश को धन्याबाद करते हैं।*गणेशोत्सव पर लगता है मेला*चिंतामन सिद्ध गणेश मंदिर में गणेश चतुर्थी से लेकर 10 दिनों तक यानी पूरी गणेश उत्सव के दौरान मेले का आयोजन किया जाता है। इस दौरान दूर-दूर से भक्त भगवान गणेश के दर्शन और आशीर्वाद लेने आते हैं। भगवान का रोज अलग-अलग तरह से श्रृंगार किया जाता है। जो भी इस मंदिर में सच्चे दिल से भगवान गणेश से कुछ मांगता है बप्पा उसकी मुराद जरूर पूरी करते हैं।
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