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फसल पर इल्लियों का हमला और पीला मोजेक वायरस से किसानों की मेहनत पर पानी फिरने का खतरा!

फसल पर इल्लियों का हमला और पीला मोजेक वायरस से किसानों की मेहनत पर पानी फिरने का खतरा!

किसान

इछावर/सीहोर: एमपी विश्वास न्यूज

इछावर/सीहोर। सीहोर जिले में
“चिंता की बड़ी ख़बर ग्रामीण इलाकों से आ रही है, जहां किसानों की फसलें इल्लियों के प्रकोप और पीला मोजेक वायरस की दोहरी मार झेल रही हैं। खेतों में खड़ी फसलें बर्बाद होने की कगार पर हैं, और किसान दिन-रात अपनी मेहनत बचाने में लगे हैं।”

सीहोर जिले के गांव सेमली जदीद, ढाबला माता, मुवाडा,मोहनपुर नौआबाद, खेजडा, शिकारपुर आदि गांवों से शिकायत है की जहां सोयाबीन, मक्का, मूंगफली फसलें इल्लियों के हमले और पीला मोजेक वायरस से बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। पत्तों को खा जाने वाली इल्लियाँ फसल को चुटकियों में चट कर रही हैं, और वहीं पीला मोजेक वायरस पत्तों को पीला और कमजोर बना रहा है।”

👨‍🌾 गांव सेमली जदीद के संतोष पटेल का कहना है की :

“हमने कितनी मेहनत से ये फसल बोई थी। अब इल्लियों ने पूरी फसल खराब कर दी है। ऊपर से मोजेक ने भी सब कुछ पीला कर दिया है। दवा भी असर नहीं कर रही।”

👩‍🌾 किसान बृज किशोर शर्मा का कहना है कि:
“हर साल कोई ना कोई बीमारी लगती है। इस बार दोहरी मार है। सरकार से मदद की उम्मीद है।”

“किसानों का कहना है कि कीटनाशकों का भी कोई खास असर नहीं दिख रहा है। स्थानीय कृषि अधिकारी निरीक्षण भी नही करते, तो कोई ठोस समाधान कहा से निकले।”

“फसलें जब इस तरह कीट और वायरस के हमले का शिकार होती हैं, तो केवल खेत ही नहीं, किसानों का भविष्य भी खतरे में पड़ जाता है। देखना होगा कि प्रशासन कब तक किसानों की इस चिंता को गंभीरता से लेता है।”

पांच सालों से कभी अतिवृष्टि तो कभी अल्प वर्षा से फसलें चौपट हो रही हैं। किसानों के, घरों में उपज कभी सुरक्षित नहीं गई। प्रकृति के प्रकोप ने किसानों के सपने चकनाचूर कर दिए। प्रकृति की मार से किसान कर्ज के बोझ तले दबा जा रहा है। किसानों को न सरकार और न ही बीमा कंपनी राहत दे पा रही है।

खरीफ सीजन की फसल सोयाबीन, उड़द, मूंगफली, मक्का आदि में पीला मौजेक वायरस व अन्य रोग लग गए हैं। इस कारण किसानों पर दोहरी मार पड़ रही है। प्रारंभ में वर्षा की लंबी खेंच और पीला मोजेक वायरस के चलते समय से पूर्व ही सूख चुकी फसलों में सोयाबीन का दाना भी नहीं पक पा रहा है।

अफलन होने से किसान दुखी हैं। पहले ही किसानों ने कर्जा लेकर महंगे दाम का बीज बोया था। अब लागत मूल्य तक निकलना मुश्किल हो गया है।

रासायनिक खेती किसान द्वारा बहुत ज्यादा की जा रही है ।ऑर्गेनिक खेती बहुत ही कम किसान कर रहे है, समय से गोबर की खाद का इस्तेमाल किया जाए तो आने वाले समय में इन इल्ली के प्रकोप और अन्य बीमारियों से फसल को बचाया जा सकता है। एवं समय पर किसान को मिट्टी परीक्षण कराना बहुत ही अनिवार्य है।

विजय मालवीय
प्रबंधक
मिट्टी परीक्षण केन्द्र, इछावर

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