खेत में ट्रैक्टर बंद हुआ तो किसान करे क्या? 15-17 किलोमीटर दूर टैंक दौड़ाए या खेती छोड़े?
“फार्मर आईडी, ई-टोकन, खाद के बाद अब डीजल पर भी संकट, खरीफ सीजन में किसानों की बढ़ी मुश्किलें”
इछावर/सीहोर। एमपी विश्वास न्यूज
इछावर/सीहोर।खरीफ सीजन की शुरुआत होते ही किसान एक के बाद एक नई परेशानियों से जूझ रहा है। पहले खाद के लिए लंबी लाइनें, फिर फार्मर आईडी और ई-टोकन की जटिल प्रक्रिया, और अब डीजल को लेकर नए नियम किसानों के लिए नई मुसीबत बनते जा रहे हैं।
सरकार के वर्तमान नियमों के अनुसार डीजल केवल वाहन में ही भरवाया जा सकता है। केन या अन्य पात्र में अतिरिक्त डीजल लेकर जाना प्रतिबंधित कर दिया गया है। नियम सुरक्षा की दृष्टि से बनाए गए हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में खेती करने वाले किसानों के लिए यह व्यवस्था भारी परेशानी का कारण बन रही है।
किसानों का कहना है कि खरीफ सीजन में दिन-रात खेतों में ट्रैक्टर चल रहे हैं। खेतों में बक्खर चलाने और बुवाई के दौरान यदि ट्रैक्टर का डीजल खत्म हो जाए तो किसान आखिर क्या करे? खेत में काम छोड़कर हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाए या फिर ट्रैक्टर लेकर 15 से 17 किलोमीटर दूर स्थित पेट्रोल पंप या फ्यूल टैंक तक दौड़ लगाए?
ग्रामीण इलाकों में अधिकांश गांवों के आसपास कोई फ्यूल टैंक उपलब्ध नहीं है। ऐसे में डीजल भरवाने के लिए किसानों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। इससे एक तरफ अतिरिक्त डीजल खर्च होता है तो दूसरी तरफ खेती का बहुमूल्य समय भी बर्बाद होता है। सीजन के दौरान समय पर खेत की तैयारी और बुवाई बेहद जरूरी होती है, लेकिन नियमों के कारण किसानों का काम प्रभावित हो रहा है।
किसानों का यह भी कहना है कि जब वे अतिरिक्त डीजल की मांग करते हैं तो फ्यूल टैंक पर कर्मचारियों के साथ विवाद की स्थिति बन जाती है। वहीं फ्यूल टैंक संचालकों का स्पष्ट कहना है कि वे गजट नोटिफिकेशन और शासन के निर्देशों के अनुसार ही डीजल का वितरण करेंगे, इसलिए नियमों का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।
अब सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि खेती-किसानी को बढ़ावा देने की बात करने वाली सरकार किसानों की इस व्यावहारिक समस्या का समाधान कैसे करेगी? आखिर खेत के बीचों-बीच डीजल खत्म होने पर किसान क्या करे? खेती बचाए या नियम निभाए?
खरीफ सीजन के बीच किसानों में असमंजस और नाराजगी बढ़ती जा रही है। किसान संगठनों का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों और कृषि कार्यों के लिए अलग से व्यवहारिक व्यवस्था बनाई जानी चाहिए, ताकि खेती प्रभावित न हो और किसान बेवजह परेशानियों का सामना न करें।